बंद कर के आँखें, जब ख़ुद को सुलाना चाहा
एक ख्वाब ने जगा दिया, जब भी सो जाना चाहा
समझा कि आसान है किसी को भूल जाना
उतनी शिद्दत से आई याद, जितनी शिद्दत से भुलाना चाहा |
चाहा कि दूर निकल जाऊं, लहरों के ज़ोर पर
किनारों से हार गया, समुंदर में जब उतर जाना चाहा
मेरे हाथों कि लकीरें भी हैं उलझी उलझी सी
वही बात उलझ गई, जिसको सुलझाना चाहा |
हजारो सवाल है इस दिल तुम्हारे लिए
जिनका जबाब मैंने तुमसे माँगना चाहा
तुम वो एहसास भी न बयां कर पाई
तुम वो न कह पाई जो तुमसे सुनना चाहा |
जकड लिया तेरी यादों ने दिल को
जब तेरी चाहत को दिल से मिटाना चाहा
हार गया मैं खुद से
जब अपने आप से लड़ना जाना चाहा |
- ध्रुव कुमार शाक्यवार
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