कुछ अरमां कुछ एहसास
Thursday, September 26, 2013
Thursday, July 7, 2011
कुछ शेर
दिन रात तेरे खयालो में खोये रहते है
हम दिल के बदले दिल देते है
हमसा कोई आशिक इस जहां में नहीं
क्योंकि हम आशिक है सौदागर नहीं |
हम दिल के बदले दिल देते है
हमसा कोई आशिक इस जहां में नहीं
क्योंकि हम आशिक है सौदागर नहीं |
जो मान जाता ये तो दिल नहीं कहते
जो नहीं टूटता ये तो शीशा नहीं कहते
हमे तो पता ही नहीं था कि दर्द क्या है
जो पता होता ये तो मोहब्बत नहीं करते |
बीती रात उनका खाव्ब भी आया
सुबह हुई तो उनका ख्याल भी आया
लेना चाहा जब लबों पे खुदा का नाम
तो खुदा से पहले उनका नाम आया |
होता आसान भुलाना अगर प्यार को
तो रिन्दों को मयखाना याद नहीं होता
जो जुदा कर पाते जिस्म से रूह को
तो साहिल लहरों का मुकद्दर नहीं होता |
जाने से पहले अलविदा कहना है
एक हाँ का उनसे इंतज़ार कहना है
अगर न होती साँसों की बंदिशे कभी
तो ख़त्म न होती मेरी इन्तहा कभी |
उसके गम को भुलाने गए थे मयखाने में
हमने छेड़े उनके फ़साने मयखाने में
हर शराब थी उनके नाम की मयखाने में
कौन कहता है की शराब हर मर्ज़ की दावा है |
Wednesday, May 25, 2011
पहली बारिश और तुम
वो काले बादलों का घिर आना
वो सर्द हवा का चलना
वो बूदों के गिरने की आवाज़
वो बीता वक़्त और तुम्हारा साथ
पहली बारिश और तुम |
वो एक छाते में चलना
वो पानी में छप-छप करना
वो हवा से छाते का उड़ जाना
वो तुम्हारा छाते के पीछे भागना
पहली बारिश और तुम |
वो बिजली का कडकडाना
वो तुम्हारा डर जाना
वो मेरा तुम पर हँसना
वो तुम्हारा मुझसे रूठ जाना
पहली बारिश और तुम |
वो बूदों को समेटना
वो तुमपर छिड़क देना
वो तुम्हारा गुस्सा हो जाना
वो मेरा तुम्हे मनाना
पहली बारिश और तुम |
वो तेरा साथ साथ चलना
वो तेरे साथ भीगना
वो तेरा फिसल कर गिर जाना
वो मेरा तुम्हे उठाना
पहली बारिश और तुम |
वो तुम्हारा बारिस में खेलना
वो तुम्हारा ज़ुल्फ़ से पानी झटकना
वो मेरा तुम्हे गौर से देखना
वो तेरा शर्म से नज़रे चुराना
पहली बारिश और तुम |
वो तेरे चेहरे से पानी टपकना
वो मोतियों का बरसना
वो तेरा धीरे से गुनगुनाना
वो मेरा मंद-मंद मुस्काना
पहली बारिश और तुम |
वो पानी का ठहर जाना
वो कागज़ की नाव चलाना
वो मिटटी से खुशबू उठना
वो दिल का मचल जाना
पहली बारिश और तुम |
बारिस की हर बूद के साथ
याद आता है तेरा साथ
तेरी यादें दिल को छू जाती है
तेरी तस्वीर आँखों में उभर आती है
पहली बारिश और तुम |
- ध्रुव कुमार शाक्यवार
Monday, May 23, 2011
जिसको सुलझाना चाहा
बंद कर के आँखें, जब ख़ुद को सुलाना चाहा
एक ख्वाब ने जगा दिया, जब भी सो जाना चाहा
समझा कि आसान है किसी को भूल जाना
उतनी शिद्दत से आई याद, जितनी शिद्दत से भुलाना चाहा |
चाहा कि दूर निकल जाऊं, लहरों के ज़ोर पर
किनारों से हार गया, समुंदर में जब उतर जाना चाहा
मेरे हाथों कि लकीरें भी हैं उलझी उलझी सी
वही बात उलझ गई, जिसको सुलझाना चाहा |
हजारो सवाल है इस दिल तुम्हारे लिए
जिनका जबाब मैंने तुमसे माँगना चाहा
तुम वो एहसास भी न बयां कर पाई
तुम वो न कह पाई जो तुमसे सुनना चाहा |
जकड लिया तेरी यादों ने दिल को
जब तेरी चाहत को दिल से मिटाना चाहा
हार गया मैं खुद से
जब अपने आप से लड़ना जाना चाहा |
- ध्रुव कुमार शाक्यवार
कहीं खो गए
कहीं खो गए है वो पल
जब तुम मेरे साथ होती थी
तुम्हारी प्यारी प्यारी बातें सुनकर
यह कुदरत भी हंस देती थी
मिलना बिछड़ना रोज़ का काम था
दूर रहकर भी तुम्हारा साथ था
मैं खुद कभी तन्हा नहीं था
हर पल तेरी यादों का साथ था
दूर कही किसी पेड़ के नीचे
तेरी यादों में आँखें मीचे
तेरा इंतज़ार मै करता था
हर आहट को तेरी आहट समझता था
तुम्हारे आने से जैसे बहार आ जाती थी
तपती धूप मै बदली छा जाती थी
झूम उठता था जैसे ये आकाश
ऐसा होता था तेरे आने का एहसास
याद आता है तेरा वो चुपके से चले आना
आँखें मूदकर मेरी पूछना बताओ पहचाना
इन सब की मुझे आदत पड़ चुकी थी
तुम्हारे आने की खबर मुझे हवा दे देती थी
जब तुम मेरे साथ होती थी
तुम्हारी प्यारी प्यारी बातें सुनकर
यह कुदरत भी हंस देती थी
मिलना बिछड़ना रोज़ का काम था
दूर रहकर भी तुम्हारा साथ था
मैं खुद कभी तन्हा नहीं था
हर पल तेरी यादों का साथ था
दूर कही किसी पेड़ के नीचे
तेरी यादों में आँखें मीचे
तेरा इंतज़ार मै करता था
हर आहट को तेरी आहट समझता था
तुम्हारे आने से जैसे बहार आ जाती थी
तपती धूप मै बदली छा जाती थी
झूम उठता था जैसे ये आकाश
ऐसा होता था तेरे आने का एहसास
याद आता है तेरा वो चुपके से चले आना
आँखें मूदकर मेरी पूछना बताओ पहचाना
इन सब की मुझे आदत पड़ चुकी थी
तुम्हारे आने की खबर मुझे हवा दे देती थी
फिर से उन पलो में खो जाने को दिल चाहता है
तेरा चेहरा अब भी इन आँखों में है ये बताने को दिल चाहता है
तुम अब भी मेरे लिए ख़ास हो, तुम अब भी मेरे पास हो
तुम अब भी मेरे लिए ख़ास हो, तुम अब भी मेरे पास हो
तुम मेरे खयाले मैं हो , तुम मेरी नज़र के उजाले मैं हो
तुम भी उन पलो को अगर याद करती हो
तो चुपके से उसी तरह वापस चली आना
तुम्हारे इंतज़ार में कही ये जिंदगी काम न पड़ जाये
बस इतना था बतलाना, बस इतना था बतलाना |
--- ध्रुव कुमार शाक्यवार
--- ध्रुव कुमार शाक्यवार
Sunday, May 22, 2011
किसी दिन
इस बेनाम से रिश्ते को निभाओ किसी दिन
जो मिल जाय कभी फुर्सत तो पास आओ किसी दिन
मिलता है सभी को सभी कुछ यहाँ किसी दिन
मुझ को तो सिर्फ़ तुम मिल जाओ किसी दिन |
बरसों से मेरा यह दिल खाली है
तुम आ जाओ इसमें किसी दिन
बरसों से तुमसे मोहब्बत की है
मुझको अपनी मोह्हबत दिखाओ किसी दिन
मेरे मुक़द्दर मैं जो लिखा है उसे मिटाना है
तकदीर मेरी तुम लिख जाओ किसी दिन |
जो मिल जाय कभी फुर्सत तो पास आओ किसी दिन
मिलता है सभी को सभी कुछ यहाँ किसी दिन
मुझ को तो सिर्फ़ तुम मिल जाओ किसी दिन |
बरसों से मेरा यह दिल खाली है
तुम आ जाओ इसमें किसी दिन
बरसों से तुमसे मोहब्बत की है
मुझको अपनी मोह्हबत दिखाओ किसी दिन
मेरे मुक़द्दर मैं जो लिखा है उसे मिटाना है
तकदीर मेरी तुम लिख जाओ किसी दिन |
- ध्रुव कुमार शाक्यवार
तुम्हारे सिवा
मैं कुछ भी नहीं हूँ तुम्हारे सिवा
यह दुनिया तो है खाली तुम्हारे सिवा
मुहब्बत तुम्हारी है दिल में मेरे
दिल में नही कुछ तुम्हारे सिवा
तुम्हारी आवाज़ को तरस के रोता हूँ मैं
सुनना चाहता नहीं कुछ तुम्हारे सिवा
आँखों में तेरा अक्स ले कर बैठा हूँ
दिखता नहीं मुझे कुछ तुम्हारे सिवा
मेरी आँखों से गिरते हुए मोंती तो देखो
इन मैं याद नहीं किसी की तुम्हारे सिवा
हशर मैं रब पूछेगा...क्या चाहिए ?
मैं कहूँगा कुछ भी नहीं, तुम्हारे सिवा
- ध्रुव कुमार शाक्यवार
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